मंगलवार, 23 सितंबर 2014

चाँद मेरा है अकेला ...



 चॉद मेरा है अकेला
चाँदनी का भव्य मेला,
खो न जाए वो कहीं
ढूँढता उसको सवेरा  ।


रात से रंजिश हुई
क्या खाक सबकुछ हो गया ?
क्या कहूँ तारों से जाकर
चाँद मेरा खो गया ?


वो तिमिर की मौन गाथा
रात से जब तुम मिले ,
चाँदनी खामोश थी
 और फूल बनके तुम खिले ।


निशा के आगोश में जब 
रूप रश्मि तर उठी, 
चाँद चंचल हो मेरा
हा ! हो न जाए वो हठी  ।


वेदना इस विरह की
व्यग्र मन होता अधीर,
 चछु चकवी हो गये
आँसू की फैली लकीर  ।


लोग मेरे आँसुओं से
अब है कतराने लगे,
शरद ऋतु ,खंजन नयन
बस तुम याद आने लगे ।


याद क्या आते नही
तारों ने जो गाये थे गीत?
जूही का निखरा रूप-यौवन
पपीहा और चातक की प्रीति ।


विस्मरण का अवसाद क्या
इतना सघन है छा गया?
या चाँद मेरा रात से
ज्यादा अँधेरा पा गया?


एक तेरे खैर की 
ख्वाहिश मेरी अब रह गयी,
ख्वाब क्या आँखे ऊनीदी
रेत सी सब ढह गयी ।


क्या कहूँ, क्या करूँ?
सारा दिवस तपता रहा 
प्रारब्ध से अवसान तक
राहें तेरी तकता रहा ।


क्या विरह की यह घड़ी 
रात की कोई बला?
रात ही अनजान थी
वो चाँद की अपनी कला ।



अतीत के पन्नो से .....










2 टिप्‍पणियां:

Madan Mohan Saxena ने कहा…

हृदयस्पर्शी भावपूर्ण प्रस्तुति.बहुत शानदार भावसंयोजन .आपको बधाई

संदीप शालीन ने कहा…

Madan mohan ji ,बहुत-बहुत धन्यवाद !