शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

गीत यादों के तेरी सुनाता रहूँ .....

बसन्तोत्सव  /मदनोत्सव पर सप्रेम : - 












 जिन्दगी महफिलों सी गुजर जायेगी,
 गीत यादों के तेरी सुनाता रहूँ।
 तुम गज़ल की तरह यूँ ही ढलती रहो,
 ऊम्र भर मैं तुम्हें गुनगुनाता रहूँ।


ख्वाहिशों की नदी बनके बहती रहो,
 मैं तमन्ना की नौका चलाता रहूँ ।
 तुम घटाओं सी उड़ती, बरसती रहो,
 प्यासे दरिया सा तुमको बुलाता रहूँ।


  वो खनकती हँसी, वो हया ओढ़नी,
 आईना बनके तुमको सजाता रहूँ।
 चाँद सा रूख तेरा, चाँदनी सी अदा,
 रात चकवी सा मैं भी बिताता रहूँ।


 गाँव से दूर अपने, शहर में तेरे,
 रोज किस्मत यूँ ही आजमाता रहूँ।
 घर नही है मेरा तो कोई गम नही,
 बस गली में तेरी आता - जाता रहूँ।


 तुम समाती रहो लेखनी में मेरे,
 कोरे कागज को अमृत पिलाता रहूँ।
 आरज़ू है मेरी, हे! मेरी मानवी,
 बनके शालीन बस तुमको गाता रहूँ।


 
 दिल्ली
10 फरवरी 2014


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